CRGB Officers' Organisation

One for All and All for One

Blog

Current Events

(Note :- The entries posted here are the views of authors of the Entrires and not of the DRGB Officers' Organisation, the Organisation does not necessarily subscribe to these)

view:  full / summary

CHANDRA SHEKHAR AZAD

Posted by drgorg on February 27, 2015 at 3:45 AM Comments comments (0)

27 फ़रवरी 1931 को शहीद

क्रांतिकारी वीर-सपूत चंद्रशेखर आजाद

को शत - शत नमन

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में देश के कई क्रांतिकारी वीर-सपूतों की याद आज भी हमारी रुह में जोश और देशप्रेम की एक लहर पैदा कर देती है. एक वह समय था जब लोग अपना सब कुछ छोड़कर देश को आजाद कराने के लिए बलिदान देने को तैयार रहते थे और एक आज का समय है जब अपने ही देश के नेता अपनी ही जनता को मार कर खाने पर तुले हैं. देशभक्ति की जो मिशाल हमारे देश के क्रांतिकारियों ने पैदा की थी अगर उसे आग की तरह फैलाया जाता तो संभव था आजादी हमें जल्दी मिल जाती.

 

वीरता और पराक्रम की कहानी हमारे देश के वीर क्रांतिकारियों ने रखी थी वह आजादी की लड़ाई की विशेष कड़ी थी जिसके बिना आजादी मिलना नामुमकिन था.

भारत का इतिहास गवाह है कि यहां कई महापुरुष हुए, जिन्‍होंने देश के लिये अपनी जान तक न्‍योछावर कर दी।उन्‍हीं में से एक हैं चंद्रशेखर आज़ाद, जिन्‍होंनेदेशप्रेम, वीरता और साहस की एक ऐसी ही मिशाल थे शहीद क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद. 25 साल की उम्र में भारत माता के लिए शहीद होने वाले इस महापुरुष के बारें में जितना कहा जाए उतना कम है. आज ही के दिन साल 1931 में चन्द्रशेखर आजाद शहीद हुए थे.भारतीय स्‍वतंत्रता संग्राम में राम प्रसाद बिसमिल और सरदार भगत सिंह के साथ अंग्रेजों की नींदें हराम कर दी थीं। पृथ्वी पर चन्द्रशेखर आजाद जैसे योद्धा का अवतरण एक चमत्कारिक सत्य है, जिससे बदरिकाश्रम के समान पवित्र उन्नाव जिले का बदरका गांव संसार में जाना जाता है. कानपुर जिसे हम क्रांति-राजधानी कह सकते है, के निकटवर्ती इसी जनपद में पं. सीताराम तिवारी के पुत्र के रूप में बालक चन्द्रशेखर जन्‍म 23 जुलाई 1906 को उत्‍तर प्रदेश के उन्‍नाव जिले के बदरका गांव में हुआ था। आजाद के पिता पंडित सीताराम तिवारी 1956 में अकाल पड़ने पर गांव छोड़ कर मध्‍य प्रदेश चले गये थे। चन्द्रशेखर का बाल्यकाल मध्य प्रदेश के मालवा में व्यतीत हुआ अंग्रेज शासित भारत में पले बढ़े आजाद की रगों में शुरू से ही अंग्रेजों के प्रति नफरत भरी हुई थी। आजाद की एक खासियत थी न तो वे दूसरों पर जुल्म कर सकते थे और न स्वयं जुल्म सहन कर सकते थे। 1919 में अमृतसर के जलियांवाला बाग कांड ने उन्‍हें झकझोर कर रख दिया था। चन्द्रशेखर उस समय पढ़ाई कर रहे थे। तभी से उनके मन में एक आग धधक रही थी। महात्‍मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन खत्‍म किये जाने पर सैंकड़ों छात्रों के साथ चन्द्रशेखर भी सड़कों पर उतर आये। छात्र आंदोलन के वक्‍त वो पहली बार गिरफ्तार हुए। तब उन्‍हें 15 दिन की सजा मिली। असहयोग आंदोलन से जागे देश में दमन-चक्र जारी था, सत्याग्रहियों के बीच निकल पड़े, प्रस्तरखंड उठाया, बेंत बरसाने वालों में से एक सिपाही के सिर में दे मारा. पेशी होने पर अपना नाम आजाद, काम आजादी के कारखाने में मजदूरी और निवास जेलखाने में बताया. गुस्साए अंग्रेज मजिस्ट्रेट ने पंद्रह बेंतों की सख्त सजा सुनाई. हर सांस में वंदेमातरम का निनाद करते हुए उन्होंने यह परीक्षा भी उत्तीर्ण की । सन 1922 में गाँधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन को अचानक बंद कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आ गया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ गये। तभी वे हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशन के सक्रिय सदस्य बन गये। आज़ाद ने क्रांतिकारी बनने के बाद सबसे पहले 1 अगस्‍त 1925 को काकोरी कांड को अंजाम दिया। इसके बाद 1927 में बिसमिल के साथ मिलकर उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसियेशन का गठन किया। भगत सिंह व उनके साथियों ने लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला संडर्स को मार कर लिया। फिर दिल्‍ली असेम्बली में बम धमाका भी आजाद ने किया। आजाद का कांग्रेस से जब मोह भंग हो गया आजाद ने अपने संगठन के सदस्‍यों के साथ गाँव के अमीर घरों में डकैतियाँ डालीं, ताकि दल के लिए धन जुटाया जा सके। इस दौरान उन्‍होंने व उनके साथियों ने एक भी महिला या गरीब पर हाथ नहीं उठाया। डकैती के वक्‍त एक बार एक औरत ने आज़ाद का पिस्तौल छीन ली तो अपने उसूलों के चलते हाथ नहीं उठाया। उसके बाद से उनके संगठन ने सरकारी प्रतिष्‍ठानों को ही लूटने का फैसला किया। अंग्रेज़ चन्द्रशेखर आज़ाद को तो पकड़ नहीं सके लेकिन बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ एवं ठाकुर रोशन सिंह को 19 दिसम्बर 1927 तथा उससे 2 दिन पूर्व राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को फाँसी पर लटकाकर मार दिया। अचूक निशानेबाज आजाद ने अपना पावन शरीर मातृभूमि के शत्रुओं को फिर कभी छूने नहीं दिया. क्रांति की जितनी योजनाएं बनीं सभी के सूत्रधार आजाद थे. कानपुर में भगत सिंह से भेंट हुई. साथियों के अनुरोध पर आजाद एक रात घर गए और सुषुप्त मां एवं जागते पिता को प्रणाम कर कर्तव्यपथ पर वापस आ गए. सांडर्स का वध-विधान पूरा कर राजगुरु, भगतसिंह और आजाद फरार हो गए. 8 अप्रैल 1929 को श्रमिक विरोधी ट्रेड डिस्प्यूट बिल का परिणाम सभापति द्वारा खोलते ही, इसके लिए नियुक्त दर्शक-दीर्घा में खड़े दत्त और भगत सिंह को असेंबली में बम के धमाके के साथ इंकलाब जिंदाबाद का नारा बुलंद करते गिरफ्तार कर लिया गया. भगत सिंह को छुड़ाने की योजना चन्द्रशेखर ने बनाई, पर बम जांचते वोहरा सहसा शहीद हो गए. घर में रखा बम दूसरे दिन फट जाने से योजना विफल हो गई. हमारी आजादी की नींव में उन सूरमाओं का इतिहास अमर है जिन्होंने हमें स्वाभिमानपूर्वक अपने इतिहास और संस्कृति की संरक्षा की अविचल प्रेरणा प्रदान की है.एकाध बार बिस्मिल तथा योगेश चटर्जी को छुड़ाने की योजना भी बनायी, लेकिन आजाद उसमें सफल नहीं हो पाये। 4 क्रान्तिकारियों को फाँसी और 16 को कड़ी कैद की सजा के बाद चन्द्रशेखर आज़ाद ने उत्तर भारत के सभी का

कान्तिकारियों को एकत्र कर 8 सितम्बर 1928 को दिल्ली के फीरोज शाह कोटला मैदान में एक गुप्त सभा का आयोजन किया। सभी ने एक नया लक्ष्य निर्धारित किया गया - "हमारी लड़ाई आखिरी फैसला होने तक जारी रहेगी और वह फैसला है जीत या मौत।" दिल्ली एसेम्बली बम काण्ड के आरोपियों भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव को फांसी की सजा सुनाये जाने पर भगत सिंह काफी आहत हुए। आज़ाद ने मृत्यु दण्ड पाये तीनों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया। क्रांतीकारी चन्द्रशेखर नेमृत्यु दण्ड पाये तीनों की सजा कम कराने के लिए सर्व प्रथम मोहन दास करम चंद गांधी से मिलने का प्रयास किया परन्तु गांधी जी द्वारा चंद्रशेखर को देश द्रोही करार देकर मिलने से इंकार करने एवं किसी भी प्रकार का सहयोग नही करने का संदेश देने पर निराश चंद्रशेखर 27 फरवरी 1931 को वे इलाहाबाद गये और जवाहरलाल नेहरू से मिले और आग्रह किया कि वे गांधी जी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फाँसी को उम्र-कैद में बदलवाने के लिये जोर डालें। नेहरू जी ने जब आजाद की बात नहीं मानी तो आजाद ने उनसे काफी देर तक बहस भी की। इस पर नेहरू जी ने क्रोधित होकर आजाद को तत्काल वहाँ से चले जाने को कहा तो वे अपने भुनभुनाते हुए बाहर आये और अपनी साइकिल पर बैठकर अल्फ्रेड पार्क चले गये। अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से मिले और इस बारे में चर्चा कर ही रहे थे कि पंडित नेहरू की सूचना पर सीआईडी का एसएसपी नॉट बाबर भारी पुलिस बल के साथ जीप से वहाँ आ पहुंचा। चन्द्रशेखर आज़ाद अपने साथी सुखदेव राज के साथ बैठकर विचार–विमर्श कर रहे थे कि तभी वहां अंग्रेजों ने उन्हें घेर लिया. चन्द्रशेखर आजाद ने सुखदेव को तो भगा दिया पर खुद अंग्रेजों का अकेले ही सामना करते रहे. अंत में जब अंग्रेजों की एक गोली उनकी जांघ में लगी तो अपनी बंदूक में बची एक गोली को उन्होंने खुद ही मार ली और अंग्रेजों के हाथों मरने की बजाय खुद ही आत्महत्या कर ली.अचूक निशानेबाज आजाद ने अपना पावन शरीर मातृभूमि के शत्रुओं को फिर कभी छूने नहीं दिया कहते हैं मौत के बाद अंग्रेज अफसर और पुलिस वाले चन्द्रशेखर आजाद की लाश के पास जाने से भी डर रहे थे. महान देश भक्त चंद्रशेखर आजाद शहीद हो भारत माता की गोद मे हमेशा के लिए सो गये । पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये आज़ाद का अन्तिम संस्कार कर दिया था।चंद्रशेखर आज़ाद को वेष बदलने में बहुत माहिर माना जाता था. वह रुसी क्रांतिकारियों की कहानी से बहुत प्रेरित थे. चन्द्रशेखर आजाद की वीरता की कहानियां कई हैं जो आज भी युवाओं में देशप्रेम की लहर पैदा कर देती हैं. देश को अपने इस सच्चे वीर स्वतंत्रता सेनानी पर हमेशा गर्व रहेगा.

बी एस बघेल


Deregulation of Interest on Savings Bank

Posted by drgorg on October 28, 2011 at 12:10 AM Comments comments (0)

Deregulation of Interest on Savings Bank

At the very out set I tender all my best wishes on Diwali to all my readers. on the eve of Diwali itself RBI, in its' monitory policy review,has deregulated the Interest on Savings Bank account.

Interest rates on savings account in developed countries such as Canada, Japan, Australia, New Zealand, UK, and USA are all deregulated and determined by the commercial banks themselves on the basis of market interest rates

In our country, recently it was increased to 4% from 3 & a half, and just a little earlier the method of payment was changed to Daily product, from Minimum Balance. Long before it was 5% whereas, RRBs and Cooperatives were allowed to pay 0.5% extra then the other commercial counterparts, if I am correct.

Now what impact would it have on Banks.?, in Commercial Banks the CASA is about 30% whereas Savings form about 25% of Total Deposits, whereas in RRBs the Savings are about 50% of total deposits.

Lets take a look at it from banks' point of view

For banks, the major part of their income is generated from the interest rate differences between the lending rate and deposit rate. Lower rate on savings helps the banks to keep the deposit rates low. CASA is usually known for its low interest costs which banks can lend at a higher  rate. The contribution of CASA in bank’s profit is very big. Any increase in the CASA rates will reduce bank’s profit. As per an estimate, CASA deposits are about 30%-50% of the total deposits.

Deregulation timing is not right because of unstable market situations. Deregulating saving accounts deposit rates may result in high cost to banks. AT this juncture of time the interest rate iis very high & credit is steadily going down, which may adversly affect profits.

The rising interest rates have already increased the prospect of NPAs again hitting the margin of banks.

Many banks have been asking RBI since long to deregulate various services provided by banks, essentially, to ensure that Banks can charge for some services which are free now.to broaden the Financial Magin, whcih is getting thinner and thinner day by day.

What the Depositers Get.?

Depositers may get a higher interest rates. Deregulating will increase competition between banks and it will benefit the depositors. Since Time deposit rates were deregularised, Depositers do have a choice to opt for a Better scheme.

But they should be ready to pay some charges whcih might come up to coverup for the losses incurred, by paying higher interest so hiked, to the Banks.

Now at the end  I think our country is clearly devided in two zones, one I would call urban and the other is rural. and what I observed is most of the savings deposits come from rural area and in small lumps, again the policy says different rate structures for say Rs. 100000/- and above and smaller amounts. So the persons with smaller ability of savings will get lower earnings as interest and Big Fries will obviously get more.

Its been long since I could write anything ,hence may be its not as good at it should have been

What do you think friends.?

Please show no mercy, your frank and straight openion is always welcome

Adieu until I come back with some more stuff to bore you.

Satyajit

For a more critical view you can read an article here


स्वामी विवेकानंद जयंती युवा दिवस

Posted by drgorg on January 13, 2011 at 12:14 PM Comments comments (0)

12 जनवरी  2011

             स्वामी विवेकानंद जयंती की हार्दिक शुभकामनाए

             स्वामी जी के विचार युवा मन की आवाज के रूप में जाना जाता है तथा उनके जन्म दिन को

            युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है .

  • हर घर  परिवार में कोई न कोई युवक युवती है जो स्वामी विवेकानंद के विचारों का प्रतिनिधित्व करते है . माता ,पिता एवं  अभिभावक की चाहत होती है की उनके संतान उच्च शिक्षा प्राप्त करे . तत्पश्चात ब्यवसायी अपने ब्यवसाय अथवा कोई नया  ब्यवसाय  के लिए ,  माध्यम वर्गीय तथा नौकरी पेशा अच्छी नौकरी की ख्वाहिश करता है , उद्योग से संबंधित ब्यक्ति नया उद्योग लगवाना चाहता है, मजदूर वर्ग की कोई ख्वाहिश परिलक्षित नहीं होता.
  • एक वर्ग ऐसा है जो ब्यवसाय अथवा उद्योग के बारे में नहीं सोच पाता परन्तु उसकी सोच अपने बच्चे को केवल नौकरी पाने के लिए प्रेरित करता है चाहे नौकरी कैसी भी हो वह वर्ग है देश की सबसे बड़ी आबादी जिसके कंधे पर सबसे ज्यादा भार होता जो सबका पेट भरता है , जिसके नाम पर बड़ी - बड़ी योजनाए बनाया जाता है , जिसकी संपत्ति हर वर्ष बिकते जा रही  है और दिनों दिन गरीबी की ओर बढ़ते जा रहा है , कर्ज के दलदल में फसते जा रहा है  वह है इस देश का  किसान .
  •  आज युवाओं में सबसे बड़ी संख्या कृषक की युवा  संतानों की है .  अधिकांश माता , पिता अभिभावक  अपनी सोंच को अपने युवा संतानों पर थोपने की कोशिश करते है , इसका सबसे बड़ा कारण उनके खुद की अधूरी इच्छा है  जो वे स्वयं पूरा नहीं कर पाए है उसे अपने संतान के माध्यम से पूरा करना चाहते है .
    युवा संतान की सोंच कुछ और होती है यही से टकराहट शुरू होती तथा युवा मन में विद्रोह शुरू हो जाता है सभी माता पिता एक जैसे  नहीं होते और न ही  उनकी सोंच एक होती है .
  • कुछ माता पिता अपने युवा संतान की सोंच को पूरा तव्वजो देते है , और अपने सन्तान की सही अथवा गलत फैसले के संबंध में उचित सलाह नहीं दे पाते परिणाम उलटा आता है .
  • अब मै युवा मन की बात करना चाहूँगा जो अपने आप  को सबसे ज्यादा ज्ञानी , जानकारी रखने वाला साबित करता है , इसमे कोई संदेह नहीं की आज की युवा पीढ़ी को तकनीकी जानकारी बहुत है , परन्तु वह तकनीकी ज्ञान उन्हें किस माध्यम से किनके द्वारा कैसे मिल पाया है , उस तकनीक के पीछे किनका हाथ है किनकी सोंच है कभी सोंचा है संभवत : नहीं .
  • आज की उन्नत तकनीक धीरे धीरे परवान चढ़ा है आधार फिर वही पुराना जिनकी मेहनत . लग्न एवं सोंच ने आज दुनिया को इतना सक्षम बना दिया और लोग कहने लगे कर लो दुनिया मुट्ठी में . आप एक स्वतन्त्र विचार धारा से ओत प्रोत नवयुवक / नवयुवती है आपकी सोंच संकीर्ण क्यों है आप केवल अपने तक ही क्यों सोंच रहे है ,अपने सोंच को विस्तार दीजिए .
  • अनंत को कब्जे में लेने का कोशिश  तो करे .कोशिश  हमेशा कामयाब होती है . आप जो करना चाहते है उसे मूर्त रूप देने का प्रयास करें , आप जो चाहे कर सकते हो ,हार मत माने . अपना प्रेरणा श्रोत उन्हें बनाए जिनकी सफलता की कहानी बहुत पुरानी नहीं है जो अपने सफलता की चरम पर है फिर भी नम्र बने हुए है आप जिस क्षेत्र को चुनना चाहे आपके सामने है चाहे वह सफल उद्योगपति , सफल ब्यवसायी  , वैज्ञानिक ,  स्वरोजगारी , बड़े पदों में आसीन CEO कोई भी हो सकता है , उनकी सफलता के पीछे उनकी सकारात्मक सोंच ,लग्न मेहनत को क्या आप नकार सकते है , शायद नहीं .
  •  केवल भाग्य के भरोसे कुछ नहीं हो सकता , हो सकता कुछ लोगो की सफलता के पीछे उनके पारिवारिक पृष्ठ भूमि भी रही है ,परन्तु अधिकांश जमीं से ही उंठे हुए लोग  है . आप उन से प्रेरणा ले जिन्होंने हार को जित में बदल दिया है जिन्होंने भूख , बिमारी एवं खुले आसमान को अपना साथी मानकर सफलता की सीढ़ी  को चढ़ा है .
  • मै आप से कहना चाहूँगा की आप अपने माता , पिता  , अभिभावक से मित्र वत ब्यवहार करे उनसे खुलकर अपनी मन की बात करे वह आपकी बात को सहर्ष स्वीकार करेगा , कही कमी दिखेगा तो निश्चित ही उस कमी को इंगित करेगा क्योकि उनके  पास अथाह  अनुभव है , अनुभव की अवहेलना मत करे .
  • आपकी प्रतिभा निखरेगी आपका हुनर ज्यादा प्रभावी साबित होगा  और आपका मेहनत रंग लाएगी सफलता आपका कदम चूमेगी , आपका सपना साकार होगा आपका नाम होगा आपका पूरा परिवार , समाज गौरव महसूस करेगा .बस अपनी सोंच को सकारात्मक रखे ,दूब की तरह नम्र बने कोई आंधी आपका कुछ बिगाड़ नहीं पायेगा . स्वामी विवेकानंद की विचारो को ग्रहण करे यही आप सभी युवा साथी से आग्रह है.   
  •  बी .एस. बघेल


दीपावली मिलन समारोह

Posted by drgorg on November 9, 2010 at 12:28 PM Comments comments (0)

दीपावली मिलन समारोह

श्री एस. पी. कोहली अध्यक्ष दुर्ग राजनांदगाँव ग्रामीण बैंक के द्वारा  अधिकारी एवं कर्मचारी संगठन के पदाधिकारियों के साथ दिनांक 8 नवम्बर 2010 को प्रधान कार्यालय राजनांदगाँव में  दीपावली मिलन समारोह का आयोजन किया गया .  समारोह में दुर्ग  राजनांदगाँव  ग्रामीण बैंक  अधिकारी संगठन से श्री ए.आर . पी . राव एवं श्री बी . एस . बघेल अध्यक्ष  ( Deu.Generl Secretary AIRRBOF) शामिल हुए . अरेबिया की  ओर से श्री एस .के . शुक्ला एवं श्री मो . आजम खान  तथा कर्मचारी संगठन की ओर से श्री रामनारायण साहू तथा अनिल मिश्रा उपस्थित हुए .  अध्यक्ष एवं महाप्रबंधक  तथा पुरे दुर्ग राजनांदगाँव ग्रामीण बैंक परिवार को हमारे द्वारा दिपावली की बधाई एवं शुभकामनाए दी गई  . समारोह में बैंक के सभी सम्मानित ग्राहकों को भी शुभकामनाए दी गई .

अध्यक्ष के द्वारा आपसी भेद भाव को समाप्त कर आपस में मिलजुलकर काम करने तथा बैंक एवं बैंक परिवार की सुख समृद्धि के लिए  सामूहिक रूप से कार्य करने तथा पुराने गिले सिकवे को भुलाकर  आपस में कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करने का आह्वान किया गया .

चर्चा में लंबित अन्य मांगो पर विचार किया गया फिक्स पर्सनल पे के संबंध में विस्तृत चर्चा किया गया तथा श्री कोहली के द्वारा संयुक्त टीम बनाकर एक सप्ताह के भीतर निराकरण करने का निर्णय लिया गया इसी कड़ी में अंत में सर्वसम्मति से श्री बी. एस. बघेल को इस कार्य को पूरा कराने की जिम्मेदारी दी गई . बैंक में नई भर्ती पदस्थापना  ,ब्यवसाय  वृद्धि , लाभप्रदता पर भी विचार किया गया . 

श्री बघेल के द्वारा बैंक के अन्य आंतरिक समस्याओं के बारे में अध्यक्ष  से चर्चा किया गया जिस पर श्री कोहली के द्वारा भविष्य में सकारात्मक रुख अपनाते हुए समस्याओ का निराकरण करने की पहल  की  गई .

श्री कोहली को उनके इस पहल के लिए धन्यवाद दिया गया तथा भविष्य में भी ऐसे आयोजन  करने के लिए प्रेरित किया गया .

बी . एस . बघेल 

 


महासचिव का अतिरिक्त सचिव के साथ बैठक संपन्&#2

Posted by drgorg on October 23, 2010 at 1:38 PM Comments comments (1)

23   अक्टूबर 2010 

अतिरिक्त सचिव के साथ बैठक संपन्न

दिल्ली में श्री एस . के. भट्टाचार्य जी महासचिव(AIRRBOF ) के साथ वित्त मंत्रालय के  बैकिंग डिविजन के अतिरिक्त सचिव एवं अन्य अधिकारियों का 22 अक्टूबर 2010  को  बैठक संपन्न हुआ . बैठक में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंको में प्रायोजक बैंको के समान पेंशन एवं अन्य सुविधाओं के  मुद्दे पर विस्तृत चर्चा की गई  .

बैठक में अतिरिक्त सचिव ने आधिकारिक रूप से बताया  की वित्त मंत्रालय क्षेत्रीय ग्रामीण बैंको में प्रायोजक बैंको के समान एक बराबर पेंशन देने के लिए सैद्धांतिक रूप से सहमत है .   जिसके लिए विस्तृत कार्य योजना तैयार किया जा रहा है . साथ ही अन्य सुविधाओं के संबंध  में भी बताया गया की अन्य सुविधाए  प्रायोजक बैंक के समान ही दिए  जाने के लिए अतिशीघ्र परिपत्र जारी करने की संभावना है . उपरोक्त जानकारी श्री भट्टाचार्यजी के द्वारा दी गई  . आप सभी को बधाई .

बी . एस . बघेल

उप महासचिव

( AIRRBOF  )


The Shortest Speach

Posted by drgorg on October 6, 2010 at 12:50 PM Comments comments (0)

Here is the Shortest speach , perhaps. But how so meaningful and thoughtful..


please read on.


Imagine life is a Game, in which you are juggling some five balls in the air. They are Work, Family, Health, Friends, and Spirit, and you are keeping all of these in the Air.


 

You will soon understand that Work is a rubber ball, if you drop it, it will bounce back. But the other four balls - Family Health Friends and Spirit, are made of Glass. If you drop one of these they will be irrevocably scuffed, marked nicked, damaged or even shattered. They will never be the same. You must understand that and strive for it.


Work efficiently during Office hours and leave on time. Give the required time to your family friends and have proper rest.

 

Value has a value only if its value is valued.

 

"This speach was delivered by Bryan Dyson, former CEO of Coca Cola Company,

 

And the same has been sent to us by Reshmin Vyas, our comerade from Gujrat.

 

Should we deleberate more on this.? or leave this for you to ponder about all the meanings in this speach.? but one thing for sure, can one imagine how much money was at his stake, ? the amount and volume of work on his shoulders when he was CEO of Coca cola.? and still look at his speach..

 

Until next time have the best of all those 5 aspects Mr Bryan Dyson discussed about.

 


नौवां द्विपक्षीय वेतन एवं बकाया वेतन का भु&#2

Posted by drgorg on August 26, 2010 at 9:30 PM Comments comments (0)

दुर्ग राजनादगाँव ग्रामीण बैंक में नौवां द्विपक्षीय वेतन समझौता के अनुसार बढे हुए वेतन का भुगतान माह अगस्त 2010 से करा दिया गया है , साथ ही 1 नवम्बर 2007 से बकाया वेतन का भुगतान भी 26 अगस्त 2010 को कर दिया गया

इसके लिए हमारा संगठन अध्यक्ष श्री एस . पी. कोहली को हार्दिक धन्यवाद देता है . उनसे आशा करता है की अन्य सुविधाओं  को भी लागू करने में सहृदयता का परिचय देवें


बी. एस. बघेल

 


प्रबंधन की विलंबित निति

Posted by drgorg on August 21, 2010 at 7:12 AM Comments comments (0)

 प्रबंधन की विलंबित निति

धन्यवाद हमारे वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी महोदय का जिन्होंने 25 जुलाई 2010 को क्षेत्रीय ग्रामीण बैंको के अध्यक्षों को संबोधित करते हुए ग्रामीण बैंक कार्मिको को नौवां द्विपक्षीय वेतन अगस्त 2010 में ही भुगतान करने का निर्देश दे दिया अन्यथा नियमो की दुहाई अनुमोदन ,बोर्ड , प्रायोजक बैंक तथा नाबार्ड की दुहाई देते हुए कम से कम तीन माह औरबिताने के बाद ही नया वेतन दिया जाता .

    भारत सरकार द्वारा नौवां द्विपक्षीय वेतन ग्रामीण बैंक कार्मिको को अगस्त 2010 में भुगतान करने  का निर्देश दुर्ग राजनांदगाँव ग्रामीण बैंक के  ही कुछ कार्मिको को अच्छा नहीं लगा . मजबूरी वश अगस्त 2010 से बढे हुए वेतन का भुगतान 

का आदेश दिया गया है . बकाया राशि के भुगतान को विलंबित करने का शरारत पूर्ण नया बहाना ढुंढ़ा गया और संबंधित कार्मिको से सहमति पत्र प्राप्त करने का नया ढोंग रचा गया . विगत लम्बे समय से कार्मिको को वेतन भुगतान निर्धारण समस्त कार्य प्रधान कार्यालय के द्वारा किया जा रहा है,फिर सहमति पत्र की आवश्यकता क्यों , केवल बकाया वेतन को कम से कम एक माह विलंब से भुगतान करना ,जिससे चौकड़ी को आत्मा संतुष्टी मिलेगी . यदि किसी कार्मिक को ज्यादा भुगतान हो जाता है तो क्या प्रबंधन उससे भुगतान की गई अतिरिक्त राशि को वसूल नहीं पायेगा तथा किसी कार्मिक को कम राशि भुगतान होने पर क्या वह कार्मिक अंतर की राशि को पाने का हकदार नहीं है, शायद दुर्ग राजनांदगाँव ग्रामीण बैंक प्रबंधन ऐसा ही सोचता हो .

जाकि रही भावना जैसी , प्रभु मूरत देखि तीन तैसी .

दुर्ग राजनांदगाँव ग्रामीण बैंक के कुछ कार्मिको को यह घंमड हो गया है कि, उनके बिना यह बैंक नहीं चल सकता वे ही इस बैंक को चला रहे है ऐसा उन्हें गुमान हो गया , और हो भी क्यों नहीं जब बैंक का मुखिया यहाँ खुले आम घोषणा करे की मै तो अमुक ब्यक्ति को सेवा निवृत होने के बाद भी उन्हें काम पर रखुंगा . भगवान न करे कही वह ब्यक्ति स्वर्ग लोक चले जाएगा दुर्ग राजनांदगाँव ग्रामीण बैंक का वर्तमान  प्रबंधन उन्हें वहां से भी ले आयेगा .

साथियों हमें हमारे अध्यक्ष का वह बात भी याद है जब वे कहते रहे कि मै इस बैंक में सेकण्ड लाइन साल भर के अंदर तैयार कर लूंगा , परन्तु वादे तो केवल वादे है.

साथियों जहां आपने बतीस माह नया वेतन के लिए  इंतजार किया वहिं बकाया वेतन के लिए एक माह और विलंब कम से कम

तथाकथित स्वयम्भू कार्मिको को आत्म संतुष्टि तो मिलेगी .

हम  धीरज रखेंगे 

बघेल बी. एस.


हमारे इस आलेख और प्रबंधन से चर्चा पश्चात् आनन् फानन में निर्णय लेकर प्रबंधन द्वारा तत्काल बकाया भुगतान के लिए टेलीफ़ोन पर ही शाखाओं को निर्देश जारी कर दिए गए .. हमारी एक और सफलता, अन्यथा यही भुगतान कई महीनों तक लंबित रखा जा सकता था . जैसा की अभी फिक्स पर्सनल पे के भुगतान के लिए किया जा रहा है.



Supreme Court Doesn't Like Bouncing Cheques

Posted by drgorg on May 5, 2010 at 1:03 PM Comments comments (0)

Section 138 Will Be More Penal Now


As the news says..Read it friends..we will have to face a lot of these cases ..


Delay in settling cheque bounce cases will now cost the defaulter dearly ,up to 20% of the cheque amount. The penalty for delayed settlement of the cheque amount, after conviction in the trial court, would rise steadily from 10% in district courts, 15% in high courts to a whopping 20% in the Supreme Court.


The SC on Monday took this radical step through a pioneering judgment which aims to curb the tendency among defaulters to sit over the amount tendered through a bounced cheque.


Saddled with 30 lakh cheque bounce cases, the SC accepted most of the suggestions offered by attorneygeneral G E Vahanvati.


A Bench comprising Chief Justice K GBalakrishnan and Justices P Sathasivam and J M Panchal also laid down guidelines for early settlement in cheque dishonour cases under Section 138 of the Negotiable Instrument Act. 


The judgment, authored by Chief Justice KG Balakrishnan, indicated that defaulters going for early settlement before the trial court would have to pay just the principal amount with applicable interest.


But if they approched the district court for settlement after being convicted by the trial court, they would have to pay 10% of the cheque amount to avoid going to jail. So if a chque amount is for Rs 1 lakh, then to compound the offence before the district court, the defaulter has to pay an additional Rs 10,000 to avoid going to jail.


Similarly, if the defaulter agrees for settlement and compounding of the offence at the HC stage,then he would have to pay 15% of the cheque amount. The amount so collected would be given to Legal Aid Authorities of the respective states which provide free legal assistance to poor litigants in various forums, the SC said.

This judgment will go a long way in reducing the pendency of over 30 lakh cheque bounce cases which have jammed the wheels of justice already slowed down by pendency of 2.7 crore cases.


During the hearing of a Section 138 case between Damodar S Prabhu and Sayed Babalal, the Bench observed that there had been an enormous rush of cases after cheque bounce was made a penal offence in1989, followed by the amendment in 2002 providing for summary trial for early resolution of the dispute.


So Be very careful when you casually write a cheque..more now since the SUPREME COURT has passed a verdict about it..


Have a very Hot and fulfilling summer


Till we meet again with another issue to discuss


Take good care of yourself


Bye

 


उन्होंने ऐसा कैसे किया.? How could they do it..?

Posted by drgorg on April 20, 2010 at 1:57 PM Comments comments (0)

 

उन्होंने ऐसा कैसे किया.?


इंडस इंड बैंक ने विगत दो वर्षों में अपने प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार किया है., विगत काफी समय से खराब  ऋणों के कारण  संघर्ष करने के बाद बैंक पुन: पटरी पर आ गया है. जो उसकी परिसंपत्तियों की गुणवत्ता और मार्जिन से देखा जा सकता है.,


कुछ ही समय पहले बैंक, अपनी अनर्जक आस्तियों (एनपीए) के ऊँचे स्तर जो सकल ऋणों के  3 प्रतिशत तक पहुँच गया था के कारण, काफी कठिन दौर से गुजर रहा था. अब बैंक अपने  एनपीए 1.2  प्रतिशत के स्तर पर लाने में सफल हो गया है और उसका नेट इंटरेस्ट मार्जिन (निम) 3 .2  प्रतिशत तक पहुँच गया है जो थोड़े ही समय पहले 1 .6 प्रतिशत  था.


3 प्रतिशत तक का निम एक अच्छा निम माना जाता है और इस स्तर को पाने में  बहुत थोड़े से बैंक ही सफल रहे हैं.


आश्चर्य यह है कि इस बैंक के कासा जमा ( करेंट अकाउंट सेविंग्स अकाउंट ) केवल 23 .7 प्रतिशत के स्तर पर हैं.  लेकिन यह भी है कि बैंक के ऋणों में 40 प्रतिशत हिस्सा कंज्यूमर (उपभोक्ता) ऋणों का है ..जो इस निम को संभव बनाता है.


कुछ और उल्लेखनीय बाते हैं जैसे कि बैंक के ऋणों में वर्ष के दौरान 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है.जो सम्पूर्ण बैंकिंग क्षेत्र की वृद्धि का दुगुना है और बैंक की फी आय में 44 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.


इंडसइंड बैंक की चर्चा क्यों ? क्योंकि उनके एनपीए सिर्फ  3 प्रतिशत पर होने पर भी बहुत ऊँचे स्तर पर माने गए, और इसी कारण से बैंक का प्रदर्शन ख़राब रहा. उनका लो कॉस्ट डिपोजिट 27 -28 प्रतिशत होने पर भी अच्छा माना जा रहा है..


इसकी तुलना हम अपने आप से करें..? लो कॉस्ट डिपोजिट लगभग 65 से  70 प्रतिशत के स्तर पर, और एनपीए 5 प्रतिशत के आस पास ..कंज्यूमर लोन जो अनसेक्यूर्ड या असुरक्षित माने जाते हैं लेकिन जिनमे वसूली शत प्रतिशत और आय अपेक्षाकृत अधिक होती है  15 प्रतिशत से भी कम के स्तर पर थे...क्यों..? क्योकि ग्रामीण बैंकों पर असुरक्षित ऋणों के लिए 15 प्रतिशत की सीमा (सीलिंग ) है.,


दुखद यह है कि शासकीय योजनाओं में जहाँ वसूली बेहद ख़राब है. कोई सीलिंग या रोक नहीं है अपितु लक्ष्य देकर उन्हें जबरिया पूरा करवाया जाता है, और यह भी कि इनमे ब्याज या सेवा शुल्क भी एक सीमित दायरे में ही लिया जा सकता है.


हमारा निष्पादन निरंतर बेहतर होता जा रहा है, लेकिन लगातार अन्य बैंको से मिल रही कठिन प्रतिस्पर्धा से क्या यह नहीं लगता कि ये छोटी छोटी बातें कई बार बहुत महत्वपूर्ण हो जाती हैं..?


अगली बार मिलने तक के लिए विदा ..


तब तक इस पर  हंसें , उपहास भी करें क्यों कि ऐसा कर के भी आप इसी विषय पर चिंतन कर रहे होंगे


आने वाला समय और अच्छा होने की शुभकामनाओं सहित 


सत्यजित

 

 



Rss_feed